Emotional heart touching story| सास ससुर और बहू की कहानी
रोज ससुर जी रात को कमरे में फिटकरी लेकर जाते थे। जब उनको गए हुए कुछ देर हो जाती, तो कमरे से सिसकारी भरी आवाजें आनी शुरू हो जाती थी। एक दिन मैंने अचानक से उनके कमरे में देखा तो मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गई, मैंने देखा कि वो खूबसूरत लड़कियों के साथ. मेरा नाम मोनी है। मेरी शादी अनुज से 3 महीने पहले ही हुई थी। मेरे ससुराल में सिर्फ मेरा पति और मेरे ससुर जी थे। मेरी सास का देहांत हुए 3 साल हो चुके थे। एक दिन मैंने पति अनुज से कहा, कि क्यों ना हम लोग मां जी की याद में उनके नाम का एक स्कूल खुलवाए, जिसमें हम गरीब अनाथ बच्चों को शिक्षा दिलवाएंगे, जिससे हमें भी पुण्य मिलेगा और वह भी अनपढ़ नहीं रहेंगे। दरअसल मेरे ससुराल का गांव ज्यादा बड़ा नहीं था, और ज्यादातर घर गरीब लोगों के ही थे। वहां पर सरकारी स्कूल न होने की वजह से अक्सर गरीब बच्चे पढ़ाई नहीं कर पाते थे, और किसी बड़े स्कूल में पढ़ने की उनकी हैसियत नहीं थी। तभी मेरी बातों से अनुज भी सहमत हो गए। अनुज सरकारी नौकरी करते थे, और जमीन जायदाद भी अच्छी होने के कारण पैसों की कोई कमी नहीं थी। खैर ऐसे ही कुछ दिन निकले। आज रविवार का दिन था, अनुज भी घर पर थे। इसलिए हम लोगों ने कहीं बाहर घूमने जाने की सोची। पिताजी से पूछा तो उन्होंने कहा, कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है, आप लोग चले जाओ, मैं शाम को अपने दोस्तों के साथ अनाथ आश्रम जाऊंगा। हम लोग उन्हें खाना वगैरह खिलाकर घूमने चले गए। शहर की काफी अच्छी अच्छी जगह पर घूमने के बाद, शाम को एकदम थक कर चूर हो चुके थे। पिताजी के लिए खाना बनाया और उन्हें खिलाकर मैं और अनुज सोने चले गए। हम लोगों ने खाना नहीं खाया, क्योंकि पूरा दिन बाहर नमकीन और स्वीट खा खा कर पेट भर चुका था। ऐसे ही दिन बीतते गए, अब हमारा स्कूल भी पूरी तरह बनकर तैयार हो गया। आज स्कूल का उदघाटन था, पिताजी को ले जाया गया और रिबन कटिंग करवाई गई। मेरे मन में जितनी खुशी थी, वह तो शायद ही किसी के मन में होगी, क्योंकि मैं हमेशा से खुले विचारों वाली
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रही हूं, और गरीब लोगों के लिए कुछ करने में तो मानो मुझे पूरी दुनिया की खुशी मिलती थी। आज पति अनुज ने भी मेरा साथ देकर मुझे सुकून के वह पल दिए, जिसका मुझे हमेशा से इंतजार रहता था। फिर स्कूल का उदघाटन हुआ। उसमें हम लोगों ने बड़े लोगों को आमंत्रित नहीं किया, जबकि उसी गांव के गरीब परिवारों को बुलाया। उन लोगों के चेहरों पर जो रौनक थी, उसका तो अंदाजा लगाना भी मुश्किल था। आखिर कुछ दिन बाद अध्यापकों को रखा गया और स्कूल शुरू करवा दिया गया। मैंने भी ग्रेजुएशन कर रखी थी, इसी वजह से मैंने भी स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया। आखिर पूरा दिन मैं घर पर अकेली खाली बैठी रहती थी, इसी बहाने मेरा भी दिन निकल जाएगा। सुबह पति अनुज का खाना तैयार करके उन्हें ऑफिस भेज देती, और पिताजी को खाना देकर स्कूल चली जाती, और पूरा दिन उन्ही मासूम और गरीब बच्चों को पढ़ाने में गुजार देती। एक दिन जब मैं स्कूल में पढ़ा रही थी, तभी पति अनुज का कॉल आया और वह कहने लगे, कि घर पर कुछ मेहमान आने वाले हैं, तुम जल्दी घर चली जाओ, और उनके लिए कुछ खाने पीने की व्यवस्था कर दो। मैं जल्दी से घर गई और किचन के काम में लग गई। तभी पिताजी आए और वह कहने लगे, कि क्या हुआ बहू तुम आज जल्दी आ गई, सब खैर खबर है ना। मैंने कहा पिताजी सब ठीक है, बस पति अनुज के कुछ मेहमान घर पर आ रहे थे, तभी मुझे जल्दी आना पड़ा, ताकि मैं चाय नाश्ते की व्यवस्था कर सकूं। फिर पिताजी अपने कमरे में चले गए, और थोड़ी ही देर बाद अनुज के साथ उनके कुछ दोस्त घर पर आए। अनुज ने कहा, कि जब मैं मनाली में पढ़ाई करता था, तब यह लोग मेरे क्लास में थे। हमारी काफी अच्छी बॉन्डिंग थी। फिर जब मैं पढ़ाई करके यहां आ गया, तो हमारी बातचीत होनी बंद हो गई। अब यह लोग यहां पर घूमने आए थे तो मुझे कॉल किया, मैंने फिर इन लोगों को हमारे घर पर इनवाइट कर लिया। उन लोगों ने चाय नाश्ता किया और कुछ देर बातें करने के बाद चले गए। जैसे ही रात का समय हुआ, हम लोगों ने खाना खाकर सोने की तैयारी कर ली। तभी मैंने देखा कि मेरे कमरे में पानी नहीं है, तो मैं पानी लेने किचन में आई, तभी मेरी नजर पिताजी पर पड़ी। उनके हाथ में फिटकरी थी और उसे लेकर वह अपने कमरे में चले गए। जब मैं पानी लेकर वापस आई तो मैने देखा, कि उनके कमरे से सिसकारी की आवाजें आ रही थी। मैं घबरा गई, कि आखिर अंदर हो क्या रहा है? फिर मैंने सोचा, कि ऐसे ही टीवी चल रहा होगा, जिससे ऐसी आवाजें आ रही होगी। मैं सोने चली गई। दूसरे दिन मैंने रात को देखा, कि पिताजी आज फिर से हाथ में फिटकरी लिए अपने कमरे की ओर जा रहे हैं, और जैसे ही उन्हें गए हुए कुछ देर हुई, तो मैंने देखा कि आज फिर से वैसी ही आवाजें आ रही थी, जैसे कल रात आ रही थी। अब यह मेरा वहम नहीं था। मुझे पक्का यकीन हो गया, कि कुछ ना कुछ तो जरूर होता है अंदर । तो मैंने पूरी बात जानने के लिए खिड़की से झांकने की कोशिश की, लेकिन खिड़की बंद होने की वजह से मैं अंदर कुछ नहीं देख पाई। लेकिन पिताजी की सिसकारी की आवाजें मुझे साफ सुनाई दे रही थी मैं डर सी गई, कि कहीं पिताजी कोई मुसीबत में तो नहीं है, लेकिन थोड़ी ही देर बाद देखा कि वह अपने कमरे से बाहर आए। मैं वही एक पर्दे के पीछे छुप गई, जिसकी वजह से वह मुझे देख नहीं पाए। वह किचन की तरफ गए और पानी पीकर वापस से अपने कमरे में आ गए। मैंने सोचा, कि यह सब बात पति अनुज को बतानी चाहिए, लेकिन मैं कमरे में गई तो वह सो चुके थे। बेचारे पूरा दिन ऑफिस में इतना काम करते हैं, इसी वजह से शाम को पूरी तरह से थक जाते हैं। दूसरे दिन सुबह उठते ही मैंने अनुज को पूरी बात बताई। मैंने अनुज से कहा, कि परसों रात को जब मैं पानी लेने किचन में गई थी, तब मैंने पिता जी के हाथ में फिटकरी देखी, जो वह अपने कमरे में लेकर जा रहे थे। जब मैं पानी लेकर वापस आने लगी तो मैंने सुना, कि पिताजी के कमरे से उनकी जोर-जोर से सिसकारी की आवाज आ रही है। मैंने उस दिन तो जैसे तैसे टीवी चलने का सोच कर बात को टाल दिया, लेकिन यही बात कल रात को भी हुई। तभी अनुज ने मुझसे
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कहा, तुमने मुझे उसी टाइम क्यों नहीं बताया। मैंने कहा, मैं आपको आई थी बताने के लिए, लेकिन तब तक आप सो चुके थे। अनुज ने कहा, चलो हम पिताजी से पूछते हैं, तो मैंने अनुज को पुछने से मना कर दिया और कहा, कि हो सकता है उन्हें कोई दिक्कत हो। हमें ऐसे उनको मुंह पर जाकर नहीं पूछना चाहिए, जिससे उन्हें कुछ शर्मिंदगी महसूस हो। पहले हमें पूरी बात जान लेनी चाहिए, कि आख़िर क्या कारण है। खैर मैंने जैसे-तैसे बात को टाल दिया और अनुज को ऑफिस भेज दिया। मैं भी स्कूल को चली गई, लेकिन स्कूल में आज मेरा पढ़ाई करवाने में बिल्कुल भी मन नहीं था। मेरे दिमाग में सिर्फ यही बात दौड़ रही थी, कि आखिर पिताजी कमरे में करते क्या हैं? फिटकरी लेकर जाते हैं, इसका तो सौ कारण निकाला जा सकता है। लेकिन यह सिसकारी की आवाजे तो मुझे बार बार कुछ अजीब ही सोचने पर मजबूर कर रही थी। खैर मैं स्कूल से घर आई, और खाना वगैरह खाकर आराम करने चली गई। तभी पिताजी वहां से गुजरे, तो मैंने उनका पीछा किया, कि आखिर वह कहां जा रहे है, लेकिन वह किचन में कुछ फल लाने ही गए थे, तो मैंने वह बात वहीं पर ही छोड़ दी। मैंने आज पूरा प्लान बना लिया, कि आज देखते हैं शाम को पिताजी की आवाज आती है या नहीं। शाम को मैं और अनुज पिताजी को खाना देकर कमरे में चले गए, लेकिन थोड़ी देर बाद मैंने बाहर आकर देखा, तो पिताजी अपने कमरे में फिटकरी लेकर जा चुके थे, और उनकी सिसकारियां की आवाजें आ रही थी। अब तो मैंने झट से अनुज को बुलाया और कहा, कि देखो आवाजें आ रही है। अनुज भागकर आने लगे, लेकिन तभी पिताजी का दरवाजा खुल गया। मैंने अनुज को कमरे के अंदर खींच लिया। मैं नहीं चाहती थी कि पिताजी को शक हो, कि हम लोग उन पर नज़र रख रहे हैं। खैर मैंने और अनुज ने विचार किया, कि कल सुबह होते ही हम पिताजी से इस बारे में बात करेंगे। जैसे तैसे सुबह हम लोगों ने पिता जी से पूछा, कि पिताजी, आप किसी मुसीबत में तो नहीं है। पिताजी कहने लगे, नहीं तो, ऐसी तो कोई बात नहीं है, तुम लोगों को ऐसा क्यों लगा? तभी अनुज कहने लगे, कि आपके कमरे से रोजाना रात में सिसकारी की आवाजें आने लगती है, तो हम लोगों ने सोचा, कि आप से पूछ लें की सब खैर खबर है ना। तभी पिताजी कहने लगे, कि सब ठीक है, कई बार क्या होता है कि टीवी में कुछ हंसी मजाक का कार्यक्रम आ जाता है, जिसे देखकर मैं जोर-जोर से हंसने और सिसकारियां भरने लगता हूं, खैर आप लोगों को क्या लगा कि मैं सिसकारी निकलता हूं। अब अनुज का वहम निकल चुका था, लेकिन मेरा नहीं, क्योंकि मैंने उस दिन खिड़की से उनकी आवाज साफ सुनी थी। टीवी के किसी कार्यक्रम की आवाज तो नहीं थी , यह तो उन्हीं के सिसकारियां की आवाज थी। मैंने अनुज से कहा, कि पिताजी हमसे जरूर कुछ छुपा रहे हैं, वो टीवी की आवाज नहीं थी। मैंने एक दिन खुद अपने कानों से खिड़की के पास खड़े होकर सुना है। अनुज ने मुझे बैठाया और कहा, अरे मोनी, तुम खामखा इतनी टेंशन लेती हो, अगर ऐसी कोई बात होती तो पिताजी हमें जरूर बताते, हो सकता है कि वह टीवी के कुछ कार्यक्रम की वजह से सिसकारियां निकलने लगे हो, और उनकी सिसकारी की आवाज ऐसे ही है, अब बुजुर्ग जो हो गए हैं। और तुम्हें ऐसा लगा होगा कि वह सिसकारी निकाल रहे हैं। तुम इतनी छोटी छोटी बातों को अपने दिमाग पर मत लिया करो, और हां! जल्दी से मेरा खाना लगा दो, मुझे ऑफिस के लिए लेट हो रहा है। मैं बेमन से अनुज के लिए खाना लगाने लग गई, क्योंकि मेरा दिमाग तो रह रह कर उसी बात पर जा रहा था, कि पिताजी ने हमसे झूठ क्यों बोला, और वह आखिर में हमसे छुपा क्या रहे थे। खैर कुछ दिन ऐसे ही निकल गए। 1 दिन मैं स्कूल में बैठी थी, तभी मेरी मां का फोन आया। उन्होंने कहा कि तुम्हारे भतीजा हुआ है, इसलिए 3 दिन के लिए तुम यहां चली आओ। मैंने यह बात घर आकर अनुज को बताई और कहा, कि मुझे अपने मायके जाना है। तभी अनुज ने परमिशन दे दी, और पिताजी से पूछा तो उन्होंने भी कहा, कि तुम चली जाओ। मैं अपने मायके चली गई, और वहां 3 दिन तक फंक्शन इंजॉय किया और सब लोगों से हंस खेलकर बातें की। इसी बीच मैं पिताजी की वह फिटकरी वाली बात पूरी तरह भूल चुकी थी। मैंने 3 दिन बाद वापिस आने की तैयारी कर ली। अनुज मुझे लाने के लिए चले आए। चाय नाश्ता करने के बाद हम लोग मायके से निकल गए और घर पर आ गए। यहां आकर मैंने देखा, कि पिताजी अपने कमरे में थे। हमें आने में काफी देर हो चुकी थी। अनुज नहाने चले गए और मैं खाना बनाने चली गई। तभी मैंने सुना, कि आज फिर से उनके कमरे से आवाज आ रही थी। शायद पिताजी को पता नहीं लगा कि हम लोग आ गए हैं। मैं उनके कमरे के पास गई, तब तक उनकी आवाज बंद हो चुकी थी। अब तो मुझे पूरा शक होने लगा था, कि पिताजी कुछ ना कुछ तो अंदर जरूर कर रहे हैं। मैंने अनुज को इस बार कुछ नहीं बताया, क्योंकि अनुज मेरी बातों पर विश्वास करने वाले नहीं थे। आखिरकार वह तो मुझे समझा कर बैठा देते, और कहते, की तुम्हे वहम हुआ हैं। मैंने प्लान बनाया, कि आखिर पता तो करू, ताकि पूरी सच्चाई सामने आए। मैंने दूसरे दिन सब प्लान बनाकर हम खाना खाकर सो गए। दूसरे दिन मैंने सोचा, कि आज मैं पिताजी के कमरे में छुपकर सब कुछ देखूंगी, कि आख़िर उनके कमरे में होता क्या है? शाम का समय हुआ, अनुज जब सो गए, तो मैं पिताजी के कमरे में जाकर, चुपके से उनके कमरे के एक कोने में छुप कर बैठ गई। कुछ देर बाद जब पिताजी कमरे में फिटकरी लेकर आए, तो मैंने देखा, कि वो एक कपड़े में फिटकरी को डालकर एक भारी चीज से उसकी ठुकाई कर रहे थे, और उसे पीसकर एकदम बुरादे जैसा बना लिया था। फिर उसमें उन्होंने कोकोनट का तेल डाला, और उसका एक लेपन जैसा तैयार किया। उस लेपन को वह अपने पूरे शरीर पर लगा रहे थे। जैसे ही वह अपने पूरे शरीर पर लगाए जा रहे थे, वैसे ही उनके मुंह जोर-जोर से आवाज आ रही थी, जैसे वह दर्द के मारे कराह रहे हो। मुझे बहुत दया आई, कि पिताजी को बहुत दर्द हो रहा है, मैं बाहर निकल कर उनसे सारी बात पूछती हूं, लेकिन मेरे पांव रुक गए, क्योंकि मैं सच्चाई जानना चाहती थी। जैसे ही पिताजी ने पूरे शरीर पर वह लेपन किया, तो दर्द के मारे पिता जी की जान निकली जा रही थी। कुछ देर लगे रहने के बाद उन्होंने उस लेपन को एक कपड़े से हटाया, और डस्टबिन में डाल दिया। फिर वो पानी पीने के लिए किचन में चले गए। मैं वहां से बाहर निकली और अपने कमरे में चली गई। दूसरे दिन मैंने अनुज को यह सारी बातें बताई। अनुज ने पहले तो मुझे डांटा, कहा कि ऐसे किसी के कमरे में चोरी चुपके झांकना गलत बात होती है। मोनी अगर तुम्हें पूरा पता लगाना ही था, तो मुझे भी बता देती, हम दोनों चलते। लेकिन मैंने अनुज को जैसे-तैसे समझाया, कि आपने पहले ही मेरी बात पर विश्वास नहीं किया था, आप मुझे समझा-बुझाकर वहीं छोड़ देते। लेकिन जब तक मैं उनके कमरे में नही जाती, तो हमें आखिर यह सच्चाई पता नहीं चलती, कि पिताजी किस समस्या से जूझ रहे हैं। मैंने अनुज से कहा, कि कोई तो बात जरूर है, पिताजी फिटकरी का लेपन बनाते हैं और अपने पुरे शरीर पर लगाते हैं। पता नहीं उन्हें क्या दिक्कत है। और जैसे ही वह अपने शरीर पर लगाते हैं, तो दर्द के मारे कराह उठते हैं। अनुज ने कहा, कि चलो हम पिता जी से अभी बात करते हैं। हम लोग पिताजी के कमरे में गए और कहा, कि पिताजी, आपको क्या समस्या है, आप फिटकरी अपने शरीर पर क्यों लगाते हैं पिताजी एकदम से सुनकर चौंक से गए, जैसे वह नहीं चाहते थे, कि हमें इस बारे में पता चले। मैंने पिता जी से कहा, कि आप मुझे माफ कर दीजिए, मैंने कल रात आपके कमरे में छुपकर आपको देख लिया था। मैं क्या करती पिताजी , हर रोज मैं आपके सिसकारी की आवाज सुनती, तो मेरे मन में तरह-तरह के वहम पैदा हो रहे थे, कि आखिर आप आपने कमरे में करते क्या हो। इसी सच्चाई को जानने के लिए मुझे कमरे में छुपना पड़ा। तभी पिताजी की आंखों में आंसू आ गए, और वह कहने लगे, कि बहु कुछ दिन पहले मेरी तबीयत खराब हो गई थी । मैं डॉक्टर के पास गया। डॉक्टर ने मुझे कहा, कि आपको चमड़ी का रोग है, जो आपको नारियल का तेल और फिटकरी पीसकर लगाने से ही जाएगा, क्योंकि मेरे पूरे शरीर में उस रोग की वजह से धब्बे जैसे पड़ने लगे थे, और पूरे शरीर में दर्द रहता था। तभी अनुज बोल पड़े, कि पिताजी, आपने मुझे इस बारे में क्यों नहीं बताया? हम आपको बड़े से बड़े डॉक्टर के पास चेकअप के लिए लेकर जाते। तभी पिताजी कहने लगे, कि बेटा तुम ऑफिस के काम में इतने व्यस्त थे, और बहू भी स्कूल में पढ़ाने जाया करती थी, तो मैंने तुम लोगो को परेशान करने का नहीं सोचा। मैंने सोचा, कि ऐसे ही बेवजह तुम लोग परेशान हो जाओगे, इसलिए मैं खुद ही डॉक्टर के पास चला गया, और डॉक्टर ने ही कहा था, कि आप कुछ दिन तक यह लेपन करेंगे, तो आपका यह चमड़ी का रोग खत्म हो जाएगा। इसी वजह से
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मैं अपने आप कमरे में लेपन करने लगा था, कि तुम लोगों को बता कर किसी भी तरह से चिन्ता में ना डालू । तभी मैंने और अनुज ने पिताजी को गले से लगा लिया, और अनुज की आंखों में भी आंसू आ चुके थे। अनुज पिताजी से कहने लगे, कि आखिर एक बेटे का फर्ज होता है, कि वह अपने पिता की हर एक बीमारी में उसकी सेवा करें, लेकिन पिताजी, आपने तो मुझे इस लायक ही नहीं समझा। पिताजी कहने लगे, कि नहीं नहीं बेटा, तुम तो मेरे श्रवन जैसे बेटे हो, बस मैं इसीलिए नहीं बताना चाहता था, कि तुम परेशान हो जाओगे। तभी अनुज ने कहा, कि आप तैयार हो जाओ, हम आपको सहर के बड़े से बड़े डॉक्टर के पास इस चमड़ी रोग का इलाज करवाने लेकर जाएंगे । और आज से आपकी पूरी सेवा मैं खुद करूंगा। पिताजी ने हम दोनों को फिर से गले लगा लिया। अब मेरे मन से भी वहम निकल चुका था, कि आखिर मैं पिताजी के ऊपर किस तरह का शक कर रही थी। खैर हम लोगों ने पिताजी को बड़े से हॉस्पिटल में ले जाकर उनका इलाज करवाया। अब हम लोगों के मन से सारी शंकाएं दूर हो चुकी थी। मुझे भी पछतावा हो रहा था, कि मुझे पूरी बात जाननी चाहिए थी, और बार बार पिताजी से पूछते रहना चाहिए था, कि उन्हें कोई दिक्कत तो नहीं हैं। दोस्तो उम्मीद करता हूं आपको हमारी कहानी पसंद आई होगी कहानी पसंद आई है तो story को लाइक करें website पर नए हैं तो सब्सक्राइब करें ताकि अगली अपडेट सबसे पहले आपको मिले
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